Monday, March 11, 2019

एक शुरू होते नाटक के दौरान


विचार छत्तीस
दिमाग़ में
गुत्थमगुत्था एक दूसरे से।
एक का सिरा पकड़ो
तो साथ आ जाते हैं छः और !
जैसे जलकुम्भी की जड़ें
भीतर-भीतर फँसाये रखती हैं
एक दूसरे को
कि कोई अकेले न निकल जाये बाहर।
क्या ख़ाक नाटक लिखूँगा ?
एक दृश्य निकलता है मन के पार्श्व से
तो चार और करने लगते हैं धक्का-मुक्की,
कि मानो उन्हें भी बस उसी वक़्त
आना हो मंच पर।
एक को सम्हालता हूँ
तो दूसरे करने लगते हैं हल्ला-गुल्ला
कि हम भी तो सच्चाई हैं
इसी वक़्त की,
उतने ही मौज़ू,
हमें कब रखोगे केंद्र में?
हम जो बाहर भी हैं हाशिये पर,
क्या मंच पर भी रह जाएंगे
नेपथ्य में ही ?

कैसे लाऊं एक साथ भाई ?
हँसी-ठट्ठा हो
तो कोई कर भी ले
एक साथ बत्तीस,
पर दुःख, पीड़ा, कसक,
एक ही पड़ जाती है भारी
एक समय में,
अगर उतर सके गहरे
ऐन मंच पर।
ऊपर से शब्दों की,
शब्द-बिम्ब की
क़दर नहीं कुछ ख़ास है अब।
दृश्य चाहिए।
दृश्य भी ऐसे गति हो जिनमें।
काठ के पुतले अभिनेता की
अनियत, लयपूर्ण सी गतियाँ,
उपकरणों के संग प्रकाश की,
तस्वीरों, चलचित्र की गतियाँ।
इनके बीच कथा के सूत्र
कोई अगर बचा पाए तो
बात अलग है।
वरना सबकी कथा अलग है
लेखक, अभिनेता, निर्देशक की,
घंटे भर को सीट में अटके
फेसबुक के अपडेट्स देखते
सम्मानित सहृदय दर्शक की
व्यथा अलग है।

और यहाँ शब्दों की बारिश !
लहू सने दृश्यों की बारिश !
न सुनी गयी आवाज़ें
जो चीख़ रहीं जाने कबसे
गिरती हैं ओलों की तरह।
खेत, शहर, क़स्बों, गाँवों
जंगल, सरहद से उठती हूक,
जो संसद सुनती है नहीं,
उसे भला लोगों के बीच
सीधा-सीधा क्यों न रखूँ?
सौ अर्थों के लोभ में कैसे
उलझा दूँ उनकी ये कथा ?
माना सच के कई पहलू हैं
पर अपना पहलू भी तो हो?
अपनी तरफ़ से देखे सच को
ठोंक बजाकर परखे सच को
शब्दों-दृश्यों में गूँथ और गढ़कर
सबसे ज़रूरी अर्थ के संग
कह देना क्या कला नहीं है?

अगर नहीं तो माफ़ करो फिर
कलाकार होने का दावा
वैसे भी करता ही नहीं,
पर छान जलेबी रीढ़ की अपनी
उन सारे शब्द-अर्थ-दृश्यों को
और उनकी उस हूक को सारी
कलाकार होने की ललक में
कैसे गोली दे दूँ?

  • आशुतोष चन्दन




Monday, February 25, 2019

ख़ुदा..आदमीयत ...और हम


ख़ुदा..आदमीयत ...और हम 

ये हिंदी ये उर्दू ये इंग्लिश के मेले
ज़ुबानों- अदीबों के लाखों झमेले
हैं ढूंढें नज़र अब ज़हनियत कहाँ है
है ढूँढे नज़र आदमीयत कहाँ है।

हैं जिनके भी पेट भरे ,जेबें ऊंची
उन्हें इंक़लाबों से मुश्किल तो होगी
डॉलर-दीनारों की बारिश है जिनपर
ऐशों-आरामों की ख्वाहिश है जिनको
उन्हें कुछ बदलने की चाहत क्यों होगी
दुआएं,सभाएं और प्रार्थनाएं
बहाने पुराने हैं उन वाइज़ों के                         
असल बात हैं उनमें हिम्मत कहाँ है
है ढूँढे नज़र आदमीयत कहाँ है।

ये मंदिर ये मस्ज़िद ये गुरुद्वारे गिरजे
नहीं है नहीं है ख़ुदा अब कहीं पे 
ख़ुदा ग़र जो होता ये आलम न होता
न होती ये नफ़रत, ये दंगे न होते
न होते कहीं चन्द दौलत के पुतले 
करोड़ों यहाँ भूखे नंगे न होते
ये तक़रीरें-प्रवचन,ये वाइज़ ये पण्डे
ये फ़तवे-ये भाषण, ये तलवार-ओ-नेज़ें
कहीं पर धरम की दुकानें न सजतीं
ये सिसकी, ये आँसू , ये चीखें न होतीं
न दंगों में लुटती कहीं  कोई अस्मत
अनाथों सी होकर ये माँएं न रोतीं।

लिखा है अगर ये ईश्वर की है मर्ज़ी
जला दो धरम  की वो सारी किताबें
ख़ुदा ग़र मोहब्बत का है नाम दूजा
तो उसकी नज़र ऐसी वहशी न होगी
अगर ढूँढना है तुम्हें कुछ कहीं भी
तो ख़ुद में तलाशो मोहब्बत है कितनी
कि तुममें बची आदमीयत है कितनी
ये मजलिस-सभाएं, ये रथ-यात्राएँ
ये पहचानो इन सब की नीयत में क्या है
कि इंसां को इनकी ज़रुरत कहाँ है ?

बस ख्वाबों-ख़यालों में सुन्दर है दुनिया
या बंगलों के अन्दर ही सुन्दर है दुनिया
बाहर तो दुनिया में है भूख पसरी
दहशत से दुनिया है सहमी  औ सिहरी 
है जिनकी भी  मुट्ठी में दौलत या ताक़त
उन्हीं के लिए ख़ूबसूरत है दुनिया।

ये सब जानते हैं, सो सब भागते हैं
सभी दौड़ में हैं, ये सब जानते है
ये सारी क़वायद है पाने की केवल
उस दौलत की दुनिया का छोटा सा कोना
उस ताक़त की दुनिया का छोटा सा कोना
वो दुनिया जो  मखमल मुलायम है दिखती
वो दुनिया जो चमके है रंग-बिरंगी
इस चमकीली मखमल की रंगत के पीछे
दबे हैं जहाँ  के गरीबों के आँसू
उनके लहू और पसीने की सुर्खी।

ये सब जानते हैं ये वाज़िब नहीं है
ये सब मानते हैं ये जायज़ नहीं है
ये सब कुछ बदल जाए
सब चाहते हैं
अमन ही अमन हो
ये सबकी है ख्वाहिश
मगर कुछ बदलने की
कुछ कर गुजरने की
फुर्सत कहाँ है ?
बहाने बनाने की आदत हुनर है
असल बात ये है ,अहम बात ये है
कि दुनिया बदलने की
कुछ कर गुजरने की
हिम्मत कहाँ है ?
है ढूँढे नज़र आदमीयत कहाँ है।

                      - आशुतोष चन्दन

'क से भय' - सत्ता का अपना व्याकरण

सच कहने के अपने ख़तरे होते हैं। सुकरात, गैलीलियो से लेकर  ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले दुनिया भर के गुमनाम से पत्रकारों, मानवाधिकार संगठन के लोगों, विद्यार्थियों आदि ने हर समय में सच बोलने की क़ीमत चुकाई है, अपनी जान देकर भी। चीजों को जानने-समझने, अपनी पक्षधरता तय करने और उसके लिए सब कुछ झोंक देने के हौसले के बीच का दौर कितना यंत्रणादायी और भयावह होता है, सब कुछ जानते-बूझते कुछ न कर पाने की कशमकश और तड़प किस हद से गुज़रती है….नाटक ‘क से भय’ इन सब को ठीक-ठीक सामने लाता है। इस नाटक को तैयार किया दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रैयी कॉलेज की थियेटर सोसायटी ‘अभिव्यक्ति’ की युवा और बहादुर छात्राओं ने। निर्देशन चैताली पंत  और उर्जिता भारद्वाज का था और इस पूरी प्रक्रिया को मार्गदर्शन मिला था राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्नातक स्वीटी रुहेल का। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के कन्वेंशन सेंटर में प्रस्तुत किया गया ये नाटक बरसों से बनाये जा रहे और आज के दौर में उभर कर आये भाषा और व्यवहार के हिंसक, स्त्रीद्वेषी, दलित-अल्पसंख्यक-विरोधी या यूँ कहें अपने मूलरूप में मानवद्रोही व्याकरण के चरित्र को अपना मूल कथ्य बनाता है। वह व्याकरण जो मुट्ठी भर सत्ता और प्रभुत्वसंपन्न लोगों द्वारा बहुसंख्यक आबादी पर जबरन थोपा जा रहा है। व्याकरण, जहाँ ‘क’ से किताब नहीं, ‘क से भय’ होता है। व्याकरण पितृसत्ता का, जो तय करता है स्त्रियों की भाषा-जीवन-व्यवहार के पैमाने। एक स्त्री क्या बोले, कितना बोले, क्या पहने, किसके सामने पहने, कहाँ कैसे जिये...सब उसी व्याकरण के हिसाब से, जिसके बनने में स्त्री का कोई सार्थक हस्तक्षेप नहीं। स्त्रियों को पुरुषों से कमतर मानने वाला  व्याकरण, जिसमें सवाल उठाने वाली स्त्रियों का कोई स्थान नहीं, बल्कि  वे स्वाभाविक रूप चरित्रहीन और अपराधी मानी जाती रही हैं। व्याकरण व्यवहार का, जो दुनिया भर के लिए निहायत ही ज़रूरी चीज़ों को गैरज़रूरी मानता है। जो मानता है कि सत्तापक्ष की दलाली ही व्यवहार का सर्वोच्च मानक है और जो इस मानक पर खरे नहीं उतरते, इस मानक को चुनौती देते हैं, वे समय की हवा के हिसाब से राष्ट्रद्रोही हैं, संस्कृति के लिए ख़तरा हैं, आतंकवादी हैं ! ऐसे समय में जब देश के तमाम मीडिया घरानों द्वारा सत्ता की दुम सहलाने की, फ़ायदे के लिए पत्रकारिता के सिद्धान्तों की दलाली करते हुए सत्ता के सामने झुक जाने की ख़बरें नाउम्मीदी का अंधेरा पैदा कर रही हैं, ‘क से भय’ जैसे नाटक ऐसी ही घातक दलालियों का चरित्र दर्शकों के सामने लाते हुए प्रतिरोध की रोशनी को और मज़बूत, और धारदार बनाते हैं। कॉलेज और विश्वविद्यालय के कैम्पसों में जहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग परिवेश और अनुभव को लिए युवा एक बेहतर कॅरियर का सपना लिए आते हैं, वहाँ ऐसे नाटकों  का लगातार होते रहना बहुत ज़रूरी है ताकि उन्हें इस बात का लगातार एहसास रहे कि उनके अपने सपने के बरक्स एक बहुत बड़ा सपना है, पिछली सदियों से चला आ रहा ….कि आने वाली पीढ़ी इस दुनिया को हमसे बेहतर सम्हालेगी, इसे और बेहतर बनाएगी। ये बहुत ज़रूरी है कि हम सब अपने-अपने सपनों में एक बेहतर दुनिया के सपनों को जगह दें। एक ऐसी दुनिया जहाँ ‘क से भय’ का व्याकरण बनने ही न पाए।